फासीवाद और मजदूर वर्ग का कार्यभार

 1.     फासीवाद

पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के युग में इटली में वर्ष-1919 में विश्व इतिहास में पहली बार फासीवाद सामने आया । गौरतलब है कि भारी उद्योग से जुड़ी बड़ी पूँजी वाली कंपनियों को खनिज लोहा, कोयला आदि कच्ची सामग्री की उपलब्धता बढ़ाने के लिए एवं उनके द्वारा तैयार मालों की बिक्री हेतु नए बाजारों को हथियाने की आकांक्षा के साथ तथा लूट के माल में हिस्सेदारी हेतु इटली प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ था । युद्ध के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ा, लोहा और इस्पात का उत्पादन तो 10 गुना तक बढ़ गया । पूँजीपति मालामाल हुए। 'फिएट' जैसी कंपनियों की पूँजी 10 गुना तक बढ़ गई। युद्ध में भारी खर्च और क्षति उठाने के बावजूद इटली की उम्मीदों को भारी धक्का लगा । अन्य साम्राज्यवादी देशों ने लूट के माल पर तो अपने-अपने हाथ साफ कर लिए लेकिन उन्होंने इटली को कोई महत्व नहीं दिया ।

वर्ष- 1919 में, युद्ध में भाग लेनेवाले बेनिटो मुसोलिनी ने युद्ध में भाग लेनेवाले करीब सौ नौजवान सिपाहियों की एक सभा में उग्रराष्ट्रवाद (अंधराष्ट्रवाद) की भावना भरी। अतीत के विशाल रोमन साम्राज्य से प्रेरणा प्राप्त करने एवं उस जैसी महत्ता प्राप्त करने की प्रतिगामी भावना से उसने रोमन दमनकारी सत्ता के प्रतीक चिह्न 'फासिस' (लकड़ी की छड़ियों के एक बंडल के ऊपर लगी कुल्हाड़ी जिसे रोमन साम्राज्य के अधिकारी प्रतीक चिह्न के रूप में धारण करते थे) के आधार पर अपने आंदोलन का नाम 'फासी डि कॉम्बैटिमेंटो' रखा । इस प्रकार फासीवाद लैटिन शब्द 'फासिस' से उद्भूत होकर एक घोर प्रतिक्रियावादी आंदोलन के रूप में चल पड़ा ।

युद्ध के बाद शस्त्रों के लिए स्थापित बाजार समाप्त हो गया एवं विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन गिर गया । कई बैंकों के ढहने  से लाखों लोग बेरोजगार हो गए।  इतालवी मुद्रा 'लीरा' का क्रमशः अवमूल्यन होता गया जिसका 1920 तक 80 प्रतिशत अवमूल्यन  हो गया । भयानक आर्थिक संकट के बीच युद्ध का खर्च मजदूरों पर लादने  के विरोध में इस्पात उद्योग से जुड़े 6 लाख मजदूरों ने मिलों पर कब्जा करना शुरू कर दिया । परेशानहाल किसान भी बड़े-बड़े भूस्वामियों की जागीरों पर कब्जा करने लगे। ऐसी स्थिति में पूँजीवादी राज्य के हस्तक्षेप को नाकाफी समझते हुए 'उद्योग महासंघ' एवं 'कृषि महासंघ' ने अंधराष्ट्रवादी, जनवाद-विरोधी व रूसी सर्वहारा क्रांति के प्रभावों को रोकने को प्रतिबद्ध मुसोलिनी के हथियारबंद दल को वित्तीय सहायता देनी शुरू कर दी। इधर मजदूर-मेहनतकश जनता की हालत लगातार खराब होती जा रही थी। जब 1922 में ट्रेड यूनियन द्वारा देशव्यापी हड़ताल की घोषणा की गई, तब मुसोलिनी ने कहा था कि अगर सरकार हड़ताल नहीं रोकेगी तो फासीवादी ऐसा करेंगे और उसके 'काली कमीजवाले लड़ाकू दल' ने मजदूर हड़ताल विफल करने में पूँजीपति वर्ग और उसकी सरकार की मदद की। आर्थिक संकट, हड़ताल, दंगों से परेशान मध्यम वर्ग मुसोलिनी की बातों में आकर उसे समर्थन देने लगा था, क्योंकि उसे लगता था कि मुसोलिनी अराजक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित कर सब कुछ ठीक कर देगा एवं खोई हुई राष्ट्रीय प्रतिष्ठा व गरिमा को बहाल कर देगा । धूर्त्त मुसोलिनी  'जोतनेवाले को जमीन'  का नारा देकर एवं पूँजीवादी जनतंत्र के स्थान पर 'निगमित राज्य' बनाने का वादा कर किसानों व अन्य लोगों को अपने पक्ष में लाने में सफल हुआ । 11 इतालवी जनरलों द्वारा सार्वजनिक रूप से फासीवादी दल के साथ मिलने की घोषणा के बाद मुसोलिनी की ताकत और बढ़ गई और उसने 24 अक्टूबर, 1922 को ऐलान किया- "या तो सरकार हमें दे दी जाए या हम रोम पर चढ़ाई करके उसे हथिया लेंगे"  ध्यान देने की बात है कि 30000 काली कमीजवालों व  20000 फासीवादी ट्रेड यूनियन के मजदूरों के साथ रोम कूच करने के अभियान हेतु औद्योगिक महासंघ और बैंक एसोसिएशन के प्रमुखों के "संयुक्त मोर्चे"  ने वित्त मुहैया किया था।

बहरहाल, 1922 में ही मुसोलिनी के प्रधानमंत्रित्व में एक गठबंधन सरकार बन गई और 1924 के चुनाव में फासीवादी पार्टी को 65 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। इसके बाद एकाधिकारी पूँजी के हित में आतंकवादी तानाशाही का नग्न नृत्य शुरू हो गया । फासीवाद-विरोधी पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, ट्रेड यूनियनों और 'स्वतंत्र' प्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया, हड़ताल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जुटान-प्रदर्शन को अपराध घोषित कर दिया गया एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल डाला गया । इतना ही नहीं, मजदूर संघ के कार्यालयों तथा वर्ग-सहयोग व क्रांति-विरोध के रास्ते पर चलनेवाले समाजवादियों के पार्टी कार्यालय को भी जलाया गया । 1935 में अफ्रीकी देश 'इथियोपिया' पर  कब्जे के बाद मुसोलिनी ने कहा, "फासीवादी युग के 14वें वर्ष में इटली को अपना साम्राज्य प्राप्त हुआ है ।" आगे के वर्षों में यहूदी-विरोधी कानून पारित किया गया तथा अल्बानिया और मजदूरों के राज्य सोवियत संघ पर भी हमले किए गए।

प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय के बाद वहाँ पर वाइमर संविधान के तहत 'सैनिक राज्य' के स्थान पर संसदीय गणतंत्र स्थापित हुआ एवं सामाजिक जनवादियों (नकली कम्युनिस्ट) के नेतृत्व में सरकार बनी। रूसी क्रांति के प्रभाव में जगह-जगह मजदूरों की सोवियतें बनने लगी थीं एवं क्रांतिकारी आंदोलन तेज होने लगे थे। क्रांतिकारी आंदोलन को बढ़ने से रोकने के लिए सरकार द्वारा एक ओर जहाँ  '8 घंटे का कार्य दिवस', बेरोजगारी बीमा, यूनियन के समझौते को मान्यता देने आदि रियायतें मिलीं, वहीं दूसरी ओर मजदूरों, सैनिकों और नाविकों के सोवियतों पर दमन-चक्र चलने लगा । यह दमन चक्र सेना के अफसरों से बनी एक 'स्वयंसेवी कोर' के माध्यम से हुआ जिसे सरकार और सेना ने हथियार और वाहन मुहैया कराए एवं पूँजीपतियों ने वित्तीय सहायता प्रदान की, ताकि सोवियतों को खत्म किया जा सके। जानने की बात है कि इनमें से एक सैनिक दस्ते का नेतृत्व एडोल्फ हिटलर ने किया । समझने की बात है कि इन सामाजिक जनवादियों ने मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आन्दोलन को आगे बढ़ने से रोकने में अपनी 

युद्ध के बाद उत्पादक मशीनरी के विस्तार, कृषि के आधुनिकीकरण हेतु अमेरिका ने अल्पकालिक ऋण जर्मन बैंकों को प्रदान किए थे। आधुनिकीकरण की योजना पूरी होते ही 1929 में आए भयानक विश्व आर्थिक संकट के चलते विश्व बाजार में माँग घटने से जर्मनी में उत्पादन-क्षमता 50 प्रतिशत तक गिर गई। 1930 में बेरोजगारों की संख्या 40 लाख तक पहुँच गई । जर्मन बैंकों ने अपनी पूँजी को दीर्घकालिक अवधि के लिए उधार दिया था जिसके परिणामस्वरुप ऋण चुकाने की समस्या और वित्तीय संकट खड़ा हो गया । संकटों को हल करने के प्रयास में मजदूरी में कमी, बेरोजगारों व अपाहिजों के भत्ते में कमी करने को  बड़े-बड़े पूँजीपति नाकाफी समझते थे। इजारेदार पूँजी की माँग थी कि संकट का सारा बोझ मजदूर वर्ग और मेहनतकश समुदाय के कंधे पर डाल दिया जाए। इधर 1923 तक स्वयंसेवी कोर के सभी स्वयंसेवक हिटलर के नेतृत्व में एक संगठन में बँध गए थे जिसका नाम था -'राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन मजदूर पार्टी' (नाजी पार्टी) । आर्थिक संकट से परेशान 26 प्रतिशत बेरोजगार, छात्र, बुद्धिजीवी, शहरी व ग्रामीण मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा, मजदूरों का एक हिस्सा और किसान नाजी पार्टी के हवाई वादों-पूँजीवादी जनतंत्र के स्थान पर निगमित राज्य बनाने, जहाँ सभी उत्पादकों को प्रतिनिधित्व, व्यापार का स्वामित्व, प्रबंध और लाभ नियोक्ता, कर्मचारी और राज्य के बीच बराबर-बराबर विभाजित करने, पूँजी और श्रम की दो शक्तियों के समान आधार पर सहयोग द्वारा मजदूरों का सामाजिक स्तर उठाने, छोटे उत्पादकों के लिए मध्ययुगीन 'गिल्ड' जैसा ढाँचा बनाने, ट्रस्टों के राष्ट्रीयकरण करने- के झांसे में आ गए । जर्मन जाति को "सर्वोच्च जाति" घोषित करते हुए एवं अल्पसंख्यक यहूदी जाति के प्रति घृणा फैलाते हुए एडोल्फ हिटलर ने अन्य सभी 'निम्न जातियों'  को लूटने व नष्ट करने का आह्वान किया । इस प्रकार नाजी पार्टी ने "पाशविक अंधराष्ट्रवाद" की निकृष्ट भावना भड़काई। 1932 के संसदीय चुनाव में नेशनल सोशलिस्ट पार्टी (नाजी पार्टी) एवं जर्मन पीपुल्स पार्टी को मिलाकर 42 प्रतिशत मत मिले जिसमें 33 प्रतिशत मत नाजी पार्टी को मिले थे ।  इस समय तक सिर्फ भारी उद्योग से जुड़ी एकाधिकारी पूँजी ही नहीं, बल्कि हल्का उद्योग से जुड़ी एकाधिकारी पूँजी भी नाजी सरकार के समर्थन में थी। 1933 के चुनाव में नाजी पार्टी को अकेले 44 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। सत्ता सँभालते ही नाजी पार्टी ने हिंसक कम्युनिस्ट विद्रोह का खतरा बताकर तमाम मजदूर अधिकारों,  जनवादी अधिकारों व नागरिक स्वतंत्रताओं-  संगठन बनाने व सभा करने के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता- को खत्म करने, राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करने एवं राजनीतिक विरोधियों को बिना किसी आरोप के गिरफ्तार करने, जेल में डालने का आदेश जारी कर दिया। विरोधियों की संपत्ति को जब्त करने के साथ विरोधियों, कम्युनिस्टों व प्रगतिशील तत्वों को भीषण यातनाएँ देकर मार डाला गया या सीधे गोली से उड़ा दिया गया । बहुत सारे लोगों को पूँजीपतियों के लिए दौलत पैदा करने हेतु गुलाम से भी बदतर हालत में उत्पादन-कार्य में लगाया गया जहाँ वे असहनीय शोषण की अकल्पनीय परिस्थितियों में कुछ महीनो में ही  मर गए । इसके अलावा 60 लाख यहूदी मार डाले गए । नारियों को उत्पीड़ित करते हुए उन्हें बच्चा पैदा करने, घर सँभालने व चर्च जाने तक सीमित कर दिया गया, यानी उन्हें पितृसत्तात्मक गुलामी में ही रहने को मजबूर किया गया । आगे के वर्षों में हिटलर ने एकाधिकारी पूँजी के हित में विश्व के पुनर्विभाजन के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत की।

इस प्रकार फासीवाद अपने "सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी रूप" में नाजीवाद के रूप में जर्मनी में सामने आया । 1935 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारिणी समिति ने सत्तारूढ़  फासीवाद के बारे में बताया कि "वह वित्तीय पूँजी के सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी, सबसे अधिक अंधराष्ट्रवादी और सबसे अधिक साम्राज्यवादी तत्वों की एक खुली आतंकवादी तानाशाही है।" यह स्पष्ट है कि फासीवाद के सत्तासीन होने यानी फासीवाद की पूर्ण विजय यानी फासीवादी तानाशाही के स्थापित होने का मतलब-"पूँजीपति वर्ग के प्रभुत्व के"  यानी उसकी तानाशाही के एक "राजकीय रूप"  व शासन-प्रशासन के तरीके-- "पूँजीवादी जनवाद के स्थान पर एक अन्य रूप- खुली आतंकवादी तानाशाही की स्थापना है।" एक वाक्य में कहें तो मजदूर के लिए फासीवाद का मतलब है -तमाम जनवादी अधिकारों से वंचित होकर दासप्रथा के एक गुलाम से भी बदतर हालत में रहते हुए परजीवी पूँजीपति वर्ग के लिए दौलत पैदा करने की मजबूरी। हमें  याद रखना होगा कि "फासीवाद मेहनतकश जनता के विशाल समुदाय पर पूँजी का सबसे खूँखार हमला है", कि  "फासीवाद मजदूर वर्ग का तथा तमाम मेहनतकशों  का सबसे क्रूर शत्रु है।"

 

2.    फासीवादी तानाशाही का बढ़ता खतरा

·        आर्थिक परिस्थिति : पूँजीवादी व्यवस्था अंतर्विरोधों से भरा रहता है जिसमें मूल अंतर्विरोध यह होता है कि उत्पादन तो सामाजिक स्तर पर होता है लेकिन उसका स्वामित्व, उसका हस्तगतकरण-वितरण व्यक्तिगत स्तर पर होता है । यह मूल अंतर्विरोध आर्थिक व राजनीतिक संकटों को जन्म देता रहता है। 1947 में पूँजीपति वर्ग के हाथ में सत्ता आने के बाद भारत राजकीय पूँजी व निजी पूँजी के साथ-साथ पूँजीवाद के पथ पर चल पड़ा । पंचवर्षीय योजना में निजी उद्यमों के लिए निर्धारित राजकीय सहायता में से आधे से अधिक राशि बड़े-बड़े पूँजीपतियों के कंपनी-समूह अपनी संचित पूँजी को भारी उद्योगों में लगाने के नाम पर हथिया रहे थे। विदेशी इजारेदारियाँ यहाँ की बड़ी पूँजी को ऋण, उपकरण व तकनीकी सहयोग के माध्यम से अपने बाजार का विस्तार कर रही थीं,  मुनाफा कमा रही थीं। निजी क्षेत्र के 80 प्रतिशत से अधिक बड़े-बड़े निगमों में विदेशी फर्मो का सहयोग था । मजदूर वर्ग के शोषण के परिणामस्वरुप पूँजीवादी संचय का यह परिणाम हुआ कि 1962 तक संपूर्ण निर्गमित पूँजी में एक करोड़ रुपए से अधिक की पूँजीवाली कंपनियों का हिस्सा 78 प्रतिशत तक हो गया था । भारतीय पूँजीपति वर्ग के इजारेदार हिस्से की ताकत को इस बात से भी समझा जा सकता है कि उसके द्वारा "नियंत्रित" 7 बड़े बैंकों में देश के तमाम बैंकों में जमा धनराशि की 65 प्रतिशत राशि जमा थी । देश में उत्पादन के साधनों की बढ़ती मात्रा में आयात करने हेतु आवश्यक विदेशी मुद्रा की सख्त किल्लत पैदा हो गई। इसके लिए सरकार को बड़ी मात्रा में विदेशी सरकारों से सहायता लेनी पड़ी । ऐसी स्थिति में करों व कीमतों में भारी वृद्धि एवं 'अनिवार्य जमा योजना' के खिलाफ तथा मजदूरी में वृद्धि के लिए मजदूर आंदोलन भी तेज हुए। कुल मिलाकर सातवें दशक के मध्य में आर्थिक संकट उठ खड़ा हुआ ।

संकट से पार पाने के क्रम में भारतीय सरकार द्वारा 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने व भूतपूर्व शासको के पेंशन बंद करने के अलावा 64 भारतीय व 42 विदेशी बीमा कंपनियों एवं 214 कोयला खानों को अपने नियंत्रण में लेने के साथ-साथ 38 प्रकार के सामानों के आयात को अपने नियंत्रण में ले लिया गया । चौथी पंचवर्षीय योजना में राजकीय क्षेत्र में पूँजी निवेश को 55 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत एवं निजी क्षेत्र में निर्धारित निवेश को घटाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया । इतना ही नहीं, इजारेदार कंपनी-समूहों पर कुछ हद तक नियंत्रण कायम करने के उद्देश्य से 1970 में 'एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यवहार अधिनियम' लागू किया गया जिसे "इंस्पेक्टर राज" और "लाइसेंस राज" कहा गया । आगे पूर्वी पाकिस्तान में सैनिक-शासन के कारण भारत में शरणार्थियों की संख्या एक करोड़ तक पहुँच गई। 3 दिसंबर, 1971 को भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया । आठवें दशक की शुरुआत से औद्योगिक उत्पादन के विकास-दर में जो गिरावट शुरू हुई, वह 1974 और 1975 में शून्य तक आ गई। औद्योगिक क्षेत्र द्वारा जनित राष्ट्रीय आय में छोटे उद्योगों का हिस्सा पिछले 23 सालों में 62 प्रतिशत से घटकर 34.6 प्रतिशत पर आ गया, यानी बड़े उद्योगों का अंश करीब दो-तिहाई तक हो गया । 1974 में  खुदरा दामों में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई। महँगाई, बेरोजगारी, जमाखोरी, कालाबाजारी को लेकर छात्र आंदोलन शुरू हुआ । मजदूर-हड़तालों में काफी तेजी आई । इस आर्थिक संकट के बीच 26 जून,1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी गई जिसके परिणामस्वरुप जनवादी अधिकारों में कटौती एवं दमन-उत्पीड़न का दौर शुरू हो गया ।

1985 से ही भुगतान संतुलन की समस्या उठ खड़ी हुई थी । बड़ी पूँजी के हित में नई आर्थिक नीति की बात राजीव गांधी द्वारा शुरू हो गई थी । 1990 आते-आते गंभीर वित्तीय संकट आ गया । मुश्किल से 3 सप्ताह के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा उपलब्ध थी । सरकार दिवालिया होने के कगार पर खड़ी थी। अंतिम दशक की शुरुआत में पिछले 1 साल में ही व्यापार-घाटा 12,400 करोड़ रुपए से 16,900 करोड़ रुपए पर पहुँच गया एवं चालू खाता घाटा 11,300 करोड़ रुपए से 17,350 करोड़ रुपए हो गया एवं वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 7 प्रतिशत से अधिक हो गया । 1991 में महँगाई-दर 13 प्रतिशत तक हो गई थी। विदेशी कर्ज जो लगातार बढ़ता जा रहा था, 1980- 81 में 194.70 करोड़ रुपए से बढ़कर 1990-91 में 1,229.50 करोड़ रुपए हो गया था । कहना न होगा कि खाड़ी युद्ध एवं सोवियत संघ के विघटन के कारण भारत का निर्यात  काफी प्रभावित हुआ था । इस भयानक आर्थिक संकट की घड़ी में जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ऋण-योजना स्थगित कर दी थी और विश्व बैंक ने सहायता रोक दी थी, तब भारत को वायुयान से 67 टन सोना ले जाकर बंधक रखना पड़ा। उपरोक्त संस्थाओं ने भारत को अपने यहाँ संरचनात्मक सुधार करने की, अंतरराष्ट्रीय लुटखोर वित्त पूँजी की खुली आवाजाही के लिए प्रतिबंधों-अवरोधों को हटाकर सुगम रास्ता बनाने की शर्त रखी, ताकि विभिन्न देशी उद्यमों में विदेशी पूँजी की भागीदारी हो सके। यहाँ के बड़े कंपनी-समूहों, बड़ी पूँजी को विदेशी पूँजी के साथ मिलकर मुनाफा बटोरने, मजदूरों-मेहनतकशों को लूटने का एक  सुअवसर था । अब वित्त पूँजी द्वारा लूट के लिए 'उदारीकरण- वैश्वीकरण' का दौर  शुरू हुआ । इस दौर में मजदूर वर्ग के बढ़ते शोषण का परिणाम यह हुआ कि जहाँ  2000 में खरबपतियों की संख्या मात्र 5 थी , वह 2014 में बढ़कर 56 हो गई। उदारीकरण के पहले ऊपर के एक प्रतिशत अमीर लोगों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा जहाँ 6 प्रतिशत था, वह 2014 में 21 प्रतिशत हो गया । ऊपर के 1 प्रतिशत धनी लोगों का देश की कुल संपत्ति में हिस्सा 2000 में 23.5 प्रतिशत था, वह बढ़कर 2015 में 31.8 प्रतिशत हो गया । इन्हीं अवधियों में मजदूर वर्ग का जीवन-स्तर लगातार गिरता गया। उदारीकरण के पूर्व नीचे के 50 प्रतिशत लोगों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा 24 प्रतिशत हुआ करता था, जो 2014 में गिरकर 15 प्रतिशत पर आ गया । उपरोक्त अवधि में नीचे के 50 प्रतिशत लोगों का देश की कुल संपत्ति में हिस्सा 8.3 प्रतिशत से गिरकर 6 प्रतिशत पर आ गया ।

कॉरपोरेट पूँजीपतियों ने अधिकतम मुनाफे के लिए, मनमाने ढंग से श्रम की लूट के लिए श्रम-कानूनों में बदलाव हेतु एवं पूँजीवादी प्रतियोगिता में टिके रहने हेतु पूँजी के लगातार विस्तार के लिए घोर प्रतिक्रियावादी-फासीवादी पार्टी भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को समर्थन दिया था और उनकी उम्मीदें पूरी होती देखी जा सकती हैं। पूँजी का संकेंद्रण और केंद्रीयकरण यानी भयानक शोषण व बड़े उद्यमों द्वारा अन्य उद्यमों के विलियन-अधिग्रहण या बहुत सारे उद्यमों के लुट जाने से इस कदर बढ़ा है कि कॉरपोरेट कंपनियों की, बड़ी-बड़ी कंपनियों की भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में इजारेदारी कायम हो गई है। 2014-15 में कॉरपोरेट कंपनियों के मुनाफे का पैमाना जहाँ 7.8 प्रतिशत था, वह 2024-25 में बढ़कर 12 प्रतिशत हो गया है । कॉरर्पोरेट मंत्रालय के अनुसार हर साल करीब 5 से 10 हजार कंपनियाँ बंद हो जा रही हैं। अदाणी-समूह का करीब 40 क्षेत्रों में एकाधिकार है। दूरसंचार के क्षेत्र में जियो और एयरटेल मिलकर 94 प्रतिशत ग्राहकों पर कब्जा किए हुए हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज तो 10 लाख करोड़ की संपदा वाली देश की पहली कंपनी बन गई है । 30 से अधिक कंपनियों का समूह- टाटा समूह 100 देशों में कारोबार करता है। आदित्य बिड़ला समूह 35 देश में अपना जाल फैलाए हुए है। इस सूची में और कई कंपनी-समूह हैं । कॉरपोरेट कंपनियों को कई तरह की छूट मिली हुई है, जिससे उनके धन में भारी वृद्धि हुई है। ऊपर की सबसे बड़ी 10 कंपनियाँ  2013-14 में 28.3 प्रतिशत कॉरपोरेट टैक्स देती थीं, जबकि 2023-24 में वे 19.9 प्रतिशत ही दे रही थीं। इससे 10 साल में उपरोक्त कॉरपोरेट कंपनियों को करीब 3 लाख करोड़ रुपए की बचत हुई। गंभीरतापूर्वक सोचने की बात है कि ऊपर की 10 प्रतिशत धनी आबादी मात्र 4 प्रतिशत जीएसटी देती है, जबकि नीचे की 50 प्रतिशत मजदूर-मेहनतकश जनता जीएसटी के रूप में 64 प्रतिशत कर अदा कर रही है । 2013-14 में जहाँ 56 खरबपति थे, वहाँ आज 2025 में 205 हो गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की गारंटी का ढोल इस तरह पीटते हैं मानो आम जनता के लिए खुशी की बात हो, लेकिन असलियत है कि मजदूर-मेहनतकश जनसाधारण का कष्ट और बढ़ेगा । पिछले 10 साल में अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना हो गया है, लेकिन बेरोजगारी-दर 5.4 प्रतिशत से बढ़कर 8 प्रतिशत हो गई है। नीचे के 50 प्रतिशत मजदूर-मेहनतकश लोगों का राष्ट्रीय आय में हिस्सा 15 प्रतिशत से गिरकर 13 प्रतिशत पर आ गया है। किसानों पर औसत कर्ज 47 हजार रुपए से बढ़कर 74 हजार रुपए हो गया है। 'किसान सम्मान निधि' के रूप में केंद्रीय सरकार द्वारा वार्षिक 6 हजार रुपए देकर उनके असंतोष को कम करने का काम कई वर्षों से चल रहा है। मजदूर-मेहनतकश जनता की बदहाली इस कदर बढ़ी है कि पिछले 5 वर्षों से 5 किलो "मुफ्त" अनाज 82 करोड़ लोगों को देना पड़ा है। ऊपर के एक प्रतिशत धनी लोग अपनी आय की जो रिपोर्ट देते हैं, वह उनकी संपत्ति का मात्र 3 से 4 प्रतिशत ही होता है । ऐसी परिस्थिति में भारत पर कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है, वह  2014 में 49 लाख करोड़ रुपए था जो बढ़कर 2024 में 205 लाख करोड़ रुपए हो गया था । एक ओर अभूतपूर्व विषमता बढ़ रही है, दूसरी ओर इजारेदार कंपनियाँ यह चाहतीं हैं कि सरकार वह हर हथकंडा अपनाए ताकि उन्हें अधिकतम मुनाफा मिल सके व उनकी इजारेदारी और मजबूती प्राप्त करे। इजारेदार कंपनी-समूह और राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गुँथे हुए हैं एवं भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की जंजीर की एक कड़ी के रूप में अस्तित्वमान है। ऐसी सूरत में कोई भी आर्थिक-वित्तीय परिघटना, जैसे कि अमेरिका द्वारा अन्य देशों के अलावा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घटना, कई कंपनियों के साथ-साथ लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर देती है। आज के दौर में विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की यह हालत है कि वह अभी एक मंदी के चक्र से उबरना शुरू करती है कि तभी दूसरी मंदी की चपेट में आ जा रही है। ऐसी मंदी की स्थिति में दुनिया के स्तर पर बेरोजगारी स्थायी रूप में कायम है। विश्व सर्वहारा के महान नेता एंगेल्स का कहना था कि हर आर्थिक संकट से निकलने के बाद अगले संकटों से निकलने का रास्ता और सँकरा होता जाता है। ऐसी परिस्थिति में भारत में गंभीर आर्थिक संकट की संभावना बनी हुई है तथा संकट से निकलने के प्रयासों में सारा बोझ मजदूर-मेहनतकश जनता पर लादने के कुकृत्य में सत्तारूढ़ भाजपा तेजी से फासीवाद की ओर कदम बढ़ा सकती है। फासीवाद को पूर्ण विजय दिलाने के लिए यहाँ पर इटली व जर्मनी की तरह आरएसएस जैसा फासीवादी अर्धसैनिक संगठन मौजूद है।

 

·        राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) की मजबूत होती स्थिति : अंग्रेजों के पास भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को धर्म के आधार पर विभाजित करने की सुचिंतित नीति थी। अंग्रेज अधिकारी सर जॉन स्ट्रेची का कहना था, "भारत में भिन्न धर्मों का एक साथ होना हमारी राजनैतिक स्थिति के लिए बहुत अच्छी बात है ।" कहना न होगा कि शक्तिहीन कर दिए गए हिंदू या मुसलमान राजे व जमींदार अपनी कुछ सहूलियतों-रियायतों की प्राप्ति के एवज में अंग्रेजी शासन के प्रति वफादारी निभा रहे थे। इस बीच राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव में जब किसान आंदोलन होने लगे, तब ये राजे व जमींदार अंग्रेजी सत्ता से और अधिक चिपक गए और अंग्रेजी सत्ता भी यही चाहती थी, क्योंकि वह जानती थी कि मिलकर ही भारत की जनता को लूटा जा सकता है। 1908 के एक पत्र में अंग्रेज अधिकारी मिंटो ने लिखा था कि इन्हें मजबूत करना होगा क्योंकि "वे अपने देशवासियों की कमजोरी को हमसे बेहतर जानते हैं।" शोषक वर्गों (राजा-जमींदार) के हितों को लेकर धर्म के आधार पर पूरे मुसलमानों को गोलबंद करनेवाले संगठन 'मुस्लिम लीग' का उद्देश्य ही था- " भारतीय मुसलमानों में अंग्रेजी सरकार के प्रति राजभक्ति की भावना को बढ़ाना ।"  इसी तरह से 'हिंदू महासभा' और 'आर.एस.एस.'  जैसे संगठनों को राष्ट्रवादी-जनवादी आंदोलनों से कोई लेना-देना नहीं था;  उनका सिर्फ एक ही मकसद था कि हिंदू हितों के नाम पर हिंदुओं को अधिक-से-अधिक गोलबंद किया जाए, ताकि मुसलमानों के विरुद्ध हिंदू शोषक वर्गों-राजा व जमींदार- की आवाज जोरदार ढंग से उठाई जा सके। ब्रितानी साम्राज्यवादी पूँजी की पक्षधरता में ही आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार ने नारा दिया था- "हिंदूवाद राष्ट्रवाद है"  बाद में सरसंघचालक गोलवलकर ने स्पष्ट रूप से कहा था-"ब्रिटिशवाद विरोध को देशभक्तिवाद और राष्ट्रवाद के समान समझा गया । यह प्रतिक्रियावादी विचार था ।”

आरएसएस विशेषाधिकारों का पक्षपोषक एवं जनवादी मूल्यों का विरोधी रहा है तथा प्रतिक्रियावादी विचारों को "अतीत की महानता" व "भारतीय गौरव" के रूप में प्रचारित करता रहा है। आरएसएस के सांगठनिक ढाँचे में चुनाव के बजाय सरसंचालक प्रमुख की इच्छा ही सर्वमान्य है कि वह जिसे चाहे उन्हें पदाधिकारी बनाए और  अपना उत्तराधिकारी बनाए। कोई महिला आर.एस.एस.  की सदस्य नहीं बन सकती है। आरएसएस ने शुरू से ही विधर्मियों, खासकर मुसलमानों से निपटने के लिए एवं विरोधियों से निपटने के लिए तथा दंगा-फसाद को अंजाम देने के लिए अपने को अर्धसैनिक संगठन के रूप में ढाला । स्वयंसेवकों को लाठी, तलवार, भाला और कटार चलाने का प्रशिक्षण शुरू से ही दिया जाता रहा है। 1939 से आर.एस.एस. का अखिल भारतीय स्तर पर फैलाव हुआ । उसने बड़े शहरों में अपने प्रचार को केंद्रित किया और दुकानदारों, व्यापारियों, निम्न-मध्यवर्ग के लोगों, विश्वविद्यालय के छात्रों एवं क्लर्कों को स्वयंसेवक बनाया । शहरों में दंगे कराए जाते रहे जिसमें विधर्मियों, खासकर प्रतिद्वंद्वी मुसलमान कारोबारियों, दुकानदारों की संपत्ति को लूट लेने, उन्हें बर्बाद करने, भगा देने की प्रतिक्रियावादी व हिंदू-बहुसंख्यकवादी भावनाएँ परवान चढ़ती रही और इस क्रम में भिन्न-भिन्न शहरों में आर.एस.एस. का फैलाव भी होता रहा । 1940 तक स्वयंसेवकों की संख्या 1 लाख तक पहुँच गई। इसी वर्ष आर.एस.एस. द्वारा सरकार के विभिन्न विभागों में कर्मी के रूप में घुसने का निर्णय लिया गया । हिंदुत्ववादी  प्रतिक्रियावादियों की शक्ति इस कदर बढ़ गई थी कि हिंदू महासभा से जुड़े डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा । गोलवलकर ने नारा दिया था- "समाजवाद नहीं, हिंदूवाद" । आर.एस.एस. को एकाधिकारी पूँजी के हित में जर्मन जाति की सर्वोच्चता-शुद्धता के नाम पर यहूदियों और तमाम विरोधियों का कत्लेआम करनेवाला जर्मनी का हिटलर पसंद है, उसके द्वारा झूठ फैलाने का तरीका भी उसे प्रिय है। इसीलिए  गोलवलकर का कहना है- "हिंदुस्तान में हमारे लिए अच्छा सबक है और इससे हमें लाभ उठाना चाहिए।"  लेकिन जर्मनी में ही जन्मे और शोषणविहीन समाज के वैज्ञानिक सिद्धांतकार कार्ल मार्क्स से उसे शत्रुतापूर्ण घृणा है। साम्यवाद उसके लिए विदेशी ''वाद" है, इसलिए उसे स्वीकार नहीं, जबकि इटली में जन्मा फासीवाद उसे प्रिय है। सबको पता है कि महात्मा गाँधी की गोडसे के द्वारा हत्या के बाद आर.एस.एस. को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था । उस समय उसने नेहरू और सरदार पटेल को  24 सितंबर, 1948 को जो पत्र लिखा था, उससे कम्युनिस्टों के प्रति उसका रुख स्पष्ट होता है --"युवाओं, खासकर छात्रों का झुकाव अधिकाधिक कम्युनिज्म की तरफ हो रहा है ... मुझे लगता है, आपकी सरकार की सत्ता और हमारी सांस्कृतिक ताकत आपस में मिलकर इस खतरे को जल्दी ही मिटा सकते हैं।" 'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्षता', इन दो शब्दों को संविधान की उद्देशिका से हटाने के लिए वह बीच-बीच में अभियान तेज करता रहता है। कहना न होगा कि वह शुरू से ही हिंदू राष्ट्र का राग इसलिए अलापता रहा है कि हिंदू राष्ट्र यानी धार्मिक राज्य के तहत मजदूर-मेहनतकश जनता शोषक पूँजीपति वर्ग के शासन को ईश्वर की मर्जी मानकर विनीत भाव से बिना किसी विरोध के स्वीकार कर ले और उसके लिए दौलत पैदा करती रहे।

बहरहाल, हिंदुत्ववादी प्रतिक्रियावादी विचारों व दंगों के माध्यम से मुसलमानों के विरुद्ध हिंदुओं को गोलबंद करते हुए आर.एस.एस. अपने कई प्रतिक्रियावादी-फासीवादी संगठनों एवं राजनीतिक पार्टी-जनसंघ के द्वारा अपने सामाजिक-राजनीतिक आधार को विस्तृत करते हुए अपनी स्वीकार्यता बढ़ाता गया तथा अपनी स्थिति मजबूत करता गया । 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने हेतु नेहरू सरकार द्वारा आर.एस.एस. को आमंत्रित भी किया गया । 1967 के विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं हरियाणा में मिलीजुली सरकार में जनसंघ शामिल भी हुई। आपातकाल के बाद पूँजीवादी विपक्षी पार्टियों को मिलाकर बनी जनता पार्टी में जनसंघ भी शामिल थी। कहना न होगा कि केंद्र और कई प्रांतों में जनता पार्टी की सरकारें बनीं। जनता पार्टी के टूटने  के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। राम मंदिर निर्माण हेतु रथ यात्रा, बाबरी मस्जिद विध्वंस एवं उदारीकरण की नीति के पाखंडपूर्ण विरोध में 'स्वदेशी जागरण' की बात करते हुए आर.एस.एस. ने शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी अपना विस्तार किया । यहाँ पर यह बता देना जरूरी है कि नई आर्थिक और औद्योगिक नीति के खिलाफ बनी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की संघर्ष समिति से आर.एस.एस. से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ अलग हो गया था । आगे, अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी । 2014 से लगातार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बने रहने के बाद आरएसएस-बीजेपी की ताकत में भारी इजाफा हुआ है। भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल एवं दुर्गा वाहिनी आदि 30 से अधिक संगठनों के माध्यम से आर.एस.एस. का लगातार फैलाव हो रहा है। उसकी शाखाओं में लगातार वृद्धि हो रही है और आज देश भर में उसकी 83,139 शाखाएँ चल रही हैं और कहा जाता है कि आर.एस.एस. से जुड़े संगठनों के सदस्यों की संख्या 3 करोड़ तक पहुँच गई है। टेलीविजन चैनलों, अखबारों पर आरएसएस-भाजपा की पकड़ तो जग-जाहिर ही हो चुकी है। इसके अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी आर.एस.एस. बड़े पैमाने पर अतीत का गौरव-गान,  इतिहास का विकृतिकरण व विज्ञान पर हमला कर रहा है एवं हिंदू-बहुसंख्यकवादी व मुसलमानों के प्रति घृणा भड़काने से संबंधित प्रचार कर रहा है। न्यायपालिका, सेना सहित राज्य की तमाम संस्थाओं के प्रमुख पदों पर आरएसएस से संबंधित लोग मौजूद हैं जो भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।

 

3.     पूँजी और फासीवादी हमले के खिलाफ अभियान

पुराने श्रम कानूनों को खत्म कर 4 लेबर कोड लाने को संकटग्रस्त पूँजी का श्रम पर जोरदार हमले के रूप में देखा जा सकता है। नए लेबर कोड के द्वारा 8 घंटे के बजाय 12 घंटे का कार्यदिवस लाने, यूनियन बनाने में भारी मुश्किलें पैदा करने,  हड़ताल करने के अधिकार में भारी कटौती करके हड़ताल करने को असंभव बनाने, 'फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट''हायर एंड फायर' के प्रावधान के द्वारा आजीविका की अनिश्चितता को बढ़ाने एवं बहुसंख्य मजदूरों को कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर करने से  मजदूरों के जिंदा रहने पर ही प्रश्न खड़ा हो गया है। 170 देशों की सूची में साप्ताहिक 49 घंटे से अधिक काम करने के मामले में भारत पहले से ही प्रथम स्थान पर है ,वहाँ भारतीय पूँजीपतियों की मंशा है कि मजदूर सप्ताह में 80 से 90 घंटे काम करें। इस तरह मजदूर वर्ग को गुलामी के भयावह शिकंजे में जकड़ने की कोशिशें जारी हैं। तीन नए आपराधिक कानूनों के माध्यम से हड़ताल व जुलूस-प्रदर्शन को भी आतंकवादी कार्रवाई घोषित कर दंडित करने का प्रावधान पूँजीवादी जनवादी राज्य को 'पुलिस राज' में बदलने जैसा है एवं जनवादी अधिकारों पर भयानक हमला है। ‘यूएपीए' कानून में कड़े प्रावधान लाने के चलते मजदूरों-मेहनतकशों की आवाज उठानेवाले, सरकार की नीतियों के आलोचक, सही खबरें दिखानेवाले, ये तमाम लोग- नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार- प्रताड़ित किए जा रहे हैं या जेलों में बंद हैं । 'पीएमएलए' कानून में संशोधन के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को असीमित अधिकार मिल गए हैं। ईडी के माध्यम से खासकर पूँजीवादी विपक्षी पार्टियों, उनके नेताओं, उनके समर्थक पूँजीतियों को झूठे मामलों में फँसाकर, गिरफ्तार कर एवं पार्टियों को तोड़कर, इजारेदार पूँजी की रक्षा हेतु राजनीतिक एकाधिकार प्राप्त करने की दिशा में भयानक षड्यंत्रपूर्ण कुकृत्य इस तरह से चल रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी टिप्पणी करनी पड़ रही है- "ईडी कई मामलों में बिना कोई ठोस सबूत के सिर्फ आरोप लगता है", कि "ईडी अपना राजनीतिक उपयोग मत होने दे।" मुसलमानों के खिलाफ राज्य मशीनरी के द्वारा भेदभाव चरम पर है। धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलानेवाले भाषणों की झड़ी लगी हुई है। अब तो हाईकोर्ट के न्यायाधीश भी इसमें शामिल हो गए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्तमान जज शेखर कुमार यादव ने विश्व हिंदू परिषद के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि बहुसंख्यक हिंदुओं की ही बात चलेगी, अल्पसंख्यकों को उनके मातहत होकर चलना होगा । इसके अलावा आर.एस.एस. से जुड़े फासीवादी संगठनों द्वारा मुसलमानों पर हमले होते ही रहते हैं। चुनाव आयोग की मनमानी चरम पर है । पूँजीवादी जनतंत्र जो रुपए की निर्णायक ताकत पर मौन रहते हुए 'एक व्यक्ति एक वोट' का हवाला देते हुए अपनी पीठ ठोंकते नहीं थकता, अब चुनाव आयोग किसी भी सूरत में भाजपा को राजनीतिक सत्ता में बनाए रखने के लिए कभी फर्जी नाम जोड़कर तो कभी मनमाने ढंग से नाम हटाकर भयानक खेल खेल रहा है। 'विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण' (एस.आई.आर.) के बहाने वह सरकार से असंतुष्ट मजदूरों-मेहनतकशों की भारी संख्या को मतदान से वंचित करना चाहता है। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग "भाजपा का एजेंट" बन गया है, कि वह "भाजपा के लिए वोट-चोरी कर रहा है", कि फर्जीवाड़ा करके सरकारें बनाई जा रही हैं, कि "अघोषित आपातकाल" है। ऐसी सूरत में चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से फासीवादी पार्टी-बीजेपी को गद्दी से उतारना टेढ़ी खीर है।  एकाधिकारी पूँजी की आक्रामकता से परेशान पूँजीपतियों, छोटे-मझोले उद्योगपतियों के हितों को व्यक्त करते हुए कांग्रेस पार्टी पुरानी स्थिति को लौटाना चाहती है, जिसमें वह 'वर्ग सहयोग' की जरूरत को स्वीकार करते हुए बड़ी पूँजी की सेवा कर रही थी। ध्यान देने की बात है कि पूँजी के हितों की रक्षक कांग्रेस पार्टी फासीवादी हमलों की भर्त्सना तो कर सकती है, लेकिन फासीवादी शक्तियों को जड-मूल से उखाड़ना न इसका लक्ष्य है और न हो सकता है, क्योंकि इन प्रतिक्रियावादी शक्तियों का उन्मूलन पूँजी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के साथ जुड़ा हुआ है। क्रांतिकारी रास्ता छोड़कर 'वर्ग -संघर्ष' के स्थान पर 'वर्ग सहयोग' की नीति पर चल रही संसदीय वामपंथी पार्टियाँ कांग्रेस-नीत महागठबंधन की पिछलग्गू बनी हुई हैं।

सिर्फ क्रांतिकारी मजदूर वर्ग ही वह शक्ति है जो पूँजी के हमले का प्रतिकार करते हुए फासीवादी शक्तियों से मुकाबला कर सकती है और पूँजी की सत्ता को उखाड़कर फासीवादी शक्तियों को जड़-मूलसहित समाप्त कर सकती है, क्योंकि उसका हित पूँजी के खिलाफ लगातार संघर्ष में ही निहित है और पूँजी की सत्ता के ध्वंस में ही उसकी गुलामी से मुक्ति संभव है। मजदूर वर्ग ने अपने वीरत्वपूर्ण संघर्षों के द्वारा इतिहास में मील के कई पत्थर स्थापित किए हैं । फ्रांसीसी पूँजीपति वर्ग की गद्दारी व षड्यंत्र से मुकाबला करते हुए फ्रांसीसी मजदूर वर्ग ने इतिहास में अपना पहला राज्य 'पेरिस कम्यून' के रूप में स्थापित किया था । रूस में पहले निरंकुश जार का तख्ता पलटकर एवं उसके बाद समाजवादी क्रांति करके मजदूर वर्ग की सत्ता स्थापित की थी। यह रूसी मजदूर वर्ग के नेतृत्व में अन्य देशों के क्रांतिकारी मजदूरों की ही ताकत थी कि फासिस्ट हिटलर को 1945 में आत्महत्या करनी पड़ी एवं उसी वर्ष मुसोलिनी गोली से उड़ा दिया गया था । आज यह स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ फासीवादी पार्टी- बीजेपी क्रमशः एक-से-एक मजदूर-विरोधी, जनविरोधी व दमनकारी कानून के माध्यम से पूँजीवादी जनवाद पर जोरदार प्रहार करते हुए खुली आतंकवादी तानाशाही लाने की तरफ अग्रसर है, यानी फासीवादी राज्य स्थापित करने की तरफ बढ़ रही है। कहना होगा कि फासीवाद का खतरा हमारे सामने खड़ा है।

सवाल है कि भारत का मजदूर वर्ग आज की जटिल परिस्थिति में क्या करे कि पूँजी के हमले व फासीवादी हमले से अपनी रक्षा कर सके, उस पर आक्रमण भी कर सके तथा फासीवाद को स्थापित होने से रोकते हुए पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ क्रांतिकारी अभियान तेज करते हुए पूँजी की सत्ता को उखाड़कर श्रम की सत्ता स्थापित कर सके, मजदूर वर्ग का शासन स्थापित कर समाजवाद के पथ पर बढ़ सके। कहने की जरूरत नहीं कि फासीवाद के खिलाफ संघर्ष एक राजनीतिक संघर्ष है जिसे मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी ही संचालित कर सकती है। लेकिन, अपने देश में अखिल भारतीय एकल क्रांतिकारी पार्टी मौजूद नहीं है। हाँ, मजदूर वर्ग के छोटे-छोटे क्रांतिकारी ग्रुप एवं छोटी पार्टियाँ जरूर हैं। ये  क्रांतिकारी संगठन अपने-अपने स्तर से जनवादी अधिकारों, मजदूर अधिकारों पर जारी हमले के खिलाफ कुछ कार्यक्रम करते रहते हैं, आरएसएस-बीजेपी के खतरनाक मंसूबों एवं पूँजीवादी व्यवस्था का भंडाफोड़ करते रहते हैं। मगर महत्वपूर्ण सवाल तो सर्वहारा वर्ग द्वारा कार्रवाई की एकता का है। अगर 'मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान' (मासा) को सर्वहारा संयुक्त मोर्चा का बीज रूप माना जाए तो इसके विकास के लिए संबंधित क्रांतिकारी राजनीतिक ग्रुपों को एक संयुक्त मंच निर्मित करना होगा, ताकि उसके निर्देशन में मजदूर-संगठनों की संयुक्त कार्रवाई में तेजी आए। सर्वहारा संयुक्त मोर्चा देशव्यापी स्तर पर कार्रवाई की एकता प्रदर्शित करेगी। इसके साथ-साथ इसके घटकों को स्थानीय स्तर पर भी जरूरी मुद्दों पर कार्रवाई की एकता को प्रदर्शित करना होगा, ताकि स्थानीय मजदूर-संगठनों को संयुक्त मोर्चा की तरफ खींचा जा सके । कहना न होगा कि सर्वहारा संयुक्त मोर्चा को जनवादी अधिकारों पर हमले के खिलाफ, श्रम-अधिकारों पर हमले के खिलाफ एवं दमनकारी काले कानूनों के खिलाफ जुझारू संघर्ष करना होगा । इसके अलावा संयुक्त राजनीतिक मंच को उन माँगों को भी चिन्हित कर संघर्ष करना होगा जिससे मजदूर आंदोलन को क्रांतिकारी दिशा में बढ़ने में सहूलियत हो, उदाहरणार्थ- राज्य से धर्म के संबंध-विच्छेद एवं धर्म को निजी मामला घोषित करने आदि माँगें। इसके अलावे लगातार प्रचारित प्रतिक्रियावादी-फासीवादी विचारों के विरुद्ध सर्वहारा क्रांतिकारी विचारों, पूँजीवादी भ्रमों को दूर करने से संबंधित विचारों का निर्माण करके संयुक्त राजनीतिक मंच को व्यापक मजदूर-संगठनों में प्रचारित करना होगा । संयुक्त राजनीतिक मंच ज्यों-ज्यों अधिकाधिक मजबूत होगा और एक पार्टी में तब्दील होने की स्थिति की ओर बढ़ता जाएगा और साथ ही, मजदूर-संगठनों के संयुक्त मंच की कार्रवाइयाँ बढ़ती जाएगी, त्यों-त्यों वामपंथी राजनीतिक दलों से जुड़े मजदूर-संगठनों के सर्वहारा संयुक्त मोर्चे में जुड़ने की संभावना बढ़ती जाएगी। इसके अलावे अन्य राजनीतिक प्रवृत्तियों वाले मजदूर-संगठनों में यह विश्वास पैदा होगा कि सर्वहारा संयुक्त मोर्चा से जुड़कर ही अपने हितों की रक्षा की जा सकती है। इस तरह से सर्वहारा संयुक्त मोर्चा साकार रूप ले सकता है। लगातार पूँजी और फासीवाद के हमले के खिलाफ कार्रवाई की एकता के सशक्त प्रदर्शन से पूँजी की मार से घायल और उत्पीड़न-दमन झेल रहे शहरी टुटपुँजियों, मेहनतकशों और मेहनतकश किसानों का विश्वास जीता जा सकता है। फिर  भविष्य में सर्वहारा संयुक्त मोर्चे के आधार पर, उसके नेतृत्व में फासीवाद-विरोधी जनमोर्चा भी कायम किया जा सकेगा ।

 

बिहार निर्माण व असंगठित श्रमिक यूनियन

 

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